Monday, July 13, 2015

'महान साहित्यकार' चेतन भगत को खुला पत्र

चेतन भगत,
आपका हिन्दी समाचार पत्र मे लिखा लेख सोशल मीडिया मे भक्तों की प्रजाति पढ़ा। ज्यादा ऊल जलूल बातों मे जाने से बेहतर होगा की सीधे आपके लिखे लेख के मुख्य बिन्दुओं के बारे मे ही आपसे बात करूँ। आपने भक्तों की तथाकथित प्रजाति का गहन विश्लेषण करने के पश्चात एक भक्त की 4 प्रमुख विशेषताओं के ईद गिर्द अपना लेख लिखा है। आपके अनुसार एक भक्त की 4 विशेषताए परिलक्षित होती हैं और जो की निमन्वत हैं:-
1- सारे भक्त पुरुष हैं,
2-उनके संवाद का कौशल अग्रेज़ी मे कमजोर है
3-भक्तों को महिलाओं से बात करने का सलीका नहीं है और वो यौन स्तर पर कुंठित हैं 
4-भक्तों को हिंदी बोलने और हिन्दू होने की कुंठा है।

आपकी पहली बात की सारे भक्त पुरुष हैं , किसी हद तक मानने योग्य है। आप जैसे व्यक्ति, जिसकी हरकतें हमने हाल फिलहाल मे प्रसारित हो रहे एक रिऐलिटि शो मे देखी है, का पुरुषो के प्रति ऐसी कुंठा रखना स्वाभाविक ही है। अगर आप के आंतरिक संरचना के कारण बाहर परिलक्षित हो रहे गुणों मे पुरुषो वाली हरकते कम हैं तो इसमें आपके जीन संरचना का दोष है न की बाकी पुरुषों का जिनकी जीन संरचना वैज्ञानिक रूप से ठीक है।

आपने भक्तों का विश्लेषण करते हुये आगे लिखा है की उनका संवाद का कौशल विशेषकर अग्रेज़ी मे कमजोर है। आपकी ये बात भी सत्य हो सकती है और क्यूंकी हमारी मातृभाषा हिन्दी है और अँग्रेजी हमारे लिए एक विदेशी भाषा है और रहेगी। वैसे मैंने आपकी कूछ एक किताबें भी पढ़ी है और विदेशी साहित्यकारों द्वारा अँग्रेजी मे लिखी किताबें भी पढ़ी है।विदेशी साहित्यकारों से आपकी किताबों का तुलना करने पर आपकी किताबें औसत से भी निम्न दर्जे के प्रतीत होती हैं। अतः आपका अँग्रेजी का संवाद कौशल भी एक सामान्य भारतीय की तरह औसत कोटी का ही है। और तो और आपकी तो हिन्दी भी औसत दर्जे से नीचे की है। आपको अपनी दोनों भाषाओं मे सुधार की आवश्यकता है।

आपके अनुसार एक भक्त की तीसरी विशेषता है की वो यौन स्तर पर कुंठित हैं और उन्हे महिलाओं से बात करने के सलीका नहीं है। रही बात महिलाओं से बात करने के सलीका तो वो मैंने आपके और ट्विंकल खन्ना के बीच हुये ट्विटर के वार्तालाप से आपके सलीका का अध्ययन कर लिया है। इसलिए इस विषय पर कम से कम आप तो ज्ञान ना दें। ऐसा अक्सर होता है की व्यक्ति आवेश मे कभी कभार कुछ ऐसा लिख जाता है जो उसे नहीं लिखना चाहिए और जब आपके जैसा 'जैंट्लमैन' (भद्रपुरुष) इस आवेश मे बह गया तो हो सकता है ट्विटर पर मौजूद सामान्य भक्त भी कभी कभी आवेश मे ऐसा कुछ लिख जाते होंगे जो सार्वजनिक रूप से स्वीकार्य ना हों।लेकिन ऐसे उदाहरण नग्न के बराबर ही हैं आप उसे एक सामान्य बात नहीं कह सकते।
और यौन स्तर पर कुंठा वाली बात कम से कम आप तो न हीं कहे, आपके ज़्यादातर किताबों के चरित्र स्वयं मे यौन कुंठित नज़र आते हैं और जैसा की सभी जानते हैं एक लेखक की रचना मे उस लेखक का सामान्य  व्यवहार अवश्य ही परिलक्षित होता है तो इस हिसाब से आपका अधिकतम जीवन भी यौन कुंठा मे ही बीता हुआ मालूम पड़ता है।

विश्लेषण की अंतिम पड़ाव मे आपके अनुसार भक्तों को हिन्दी बोलने और हिदु होने की कुंठा होती है। महानुभाव जी आपके अंदर ये भावना होगी किन्तु मुझमे या किसी और भक्त के अंदर कम से कम इस बात को लेकर कुंठा होने की बात आप जैसा बेवकूफ और त्वरित प्रसिद्धि की आस रखने वाला कोई लेखक ही लिख सकता है। मेरे ख्याल से आपको विश्लेषण के विज्ञान की तनिक और जानकारी लेने की आवश्यकता है। 4-5 औसत स्तर की किताबें लिख देने से और कुछ एक रिऐलिटि शो मे जज बन जाने से शायद आप स्वयं को सोशल मीडिया का जज समझने लगे हैं तो आपको आत्म विश्लेषण की आवश्यकता ज्यादा है। योगा करें, इससे शायद आपको मन और शरीर के बीच समंजस्य स्थापित करने मे थोड़ी सफलता अवश्य मिलेगी।


एक स्वाभिमानी भक्त




Thursday, May 7, 2015

क्या फोर्ड फ़ाउंडेशन गैर सरकारी संस्था है ?

फोर्ड फ़ाउंडेशन गैर सरकारी संस्था के रूप मे जानी जाती है एवं यह विभिन्न देशों मे कार्यरत गैर सरकारी संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करती है। प्रत्यक्ष रूप मे इस संस्था का उद्देश्य इसके द्वारा दिये गए दान से स्पष्टतः अलग प्रतीत होता है। यह पाया गया है की गुप्त रूप से यह संस्था राजनैतिक दलों को अपने गुप्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी आर्थिक सहायता देती है। विभिन्न एशियाई एवं अरब देशों मे कार्यरत विभिन्न संस्थाएं सरकार विरोधी कार्यो के लिए फोर्ड फ़ाउंडेशन से प्राप्त धन का दुरुपयोग करते पाये गए हैं। भारत मे भी ग्रीन पीस एवं अन्य कई गैर सरकारी संस्थाओं ने फोर्ड फ़ाउंडेशन से प्राप्त धन का उपयोग सरकार के विभिन्न योजनाओं के विरोध हेतु उपयोग किया है जिनमे कोड़कुलनम मे प्रस्तावित नाभिकीय रिएक्टर की स्थापना का विरोध भी है। नर्मदा बचाओ आंदोलन तथा ग्रीन पीस द्वारा संचालित कई कार्यक्रम संदेह के घेरे मे रहे हैं। आप पार्टी को भी परोक्ष एवं प्रत्यक्ष रूप से इस संस्था से धन प्राप्त होता रहा है, जिसका उपयोग आप पार्टी ने राजनैतिक रूप मे चुनाव लड़ने मे किया है। भारत सरकार द्वारा इस संस्था से धन प्राप्ति या संस्था द्वारा धन दिये जाने पर रोक लगाने के बाद अमेरिकी सरकार ने इस संबंध मे भारत सरकार से प्रश्न किया है।

यह सर्वविदित है की सीआईए द्वारा अपने गुप्त उद्देश्य, एशियाई देशों मे अस्थिरता पैदा करने, हेतु कई संस्थाएं बनाई एवं संचालित की जा रही है। अमेरिकी सरकार के कथनी एवं करनी मे हमेशा अंतर रहा है खास कर जब पाकिस्तानी हित का प्रश्न उपस्थित हो। कई भारतीय गैर सरकारी संस्थाएं मानवाधिकार के नाम पर पुलिस एवं आर्मी द्वारा किए गए कार्यवाही एवं मारे गए दोषी व्यक्तियों के बचाव मे विरोध एवं हल्ला गुल्ला की राजनीत करते रहे हैंजैसे बटला हाउस कांडनुसरत जहां कांड। जबकि बटला जौसे कांड मे एक पुलिस निरीक्षक की मृत्यु हुई है एवं नुसरत जहां के बारे मे अंतर्राष्ट्रीय आतंकी हेडली ने अमेरिका मे ही बयान दिया है।  

यदि फोर्ड फ़ाउंडेशन गैर सरकारी संस्था है तो अमेरिकी सरकार इसे क्यों सरकारी संस्था मानते हुये इसके कार्यों मे रोक के प्रति इतनी चिंतित है। किसी अन्य देश द्वारा अपने गैर सरकारी संस्था के क्रियाकलाप पे रोक के प्रति इतनी चिंता कभी नहीं दिखाई है। अमेरिकी सरकार क्यों नहीं फोर्ड फ़ाउंडेशन के धन का उपयोग अपने यहाँ नस्लवाद्द समाप्ती मे प्रयोग करती है तथा बाल्टीमोर की घटना मे अश्वेत हितों की रक्षा मे कितना दान दिया है।

अमेरिकी सरकार द्वारा फोर्ड फ़ाउंडेशन से दान प्राप्ति पर रोक के संबंध मे किए गए प्रश्न स्पष्ट करते हैं की फोर्ड फ़ाउंडेशन अमेरिकी सरकार द्वारा पोषित छद्म गैर सरकारी संस्था है और इसके हितों के विरुद्ध किए गए कार्य अमेरिकी सरकार अपने उद्देश्य पूर्ति मे बाधक मानती है। आप पार्टी का चरित्र सर्व विदित हो चुका है तथा उन्हे भारत के हित से ज्यादा पाकिस्तानी हितों की परवाह है जिससे वोट बैंक का निर्माण कर सकें।

भारत सरकार को अमेरिकी सरकार के विरोध के बावजूद फोर्ड फ़ाउंडेशन से भारतीय संस्थाओं द्वारा धन ;प्राप्ति पर रोक जारी रखनी चाहिए। 

Friday, February 13, 2015

बनारस टॉकीज - बूक रिव्यू (पुस्तक समीक्षा)



बनारस टॉकीज , जैसा की नाम से प्रतीत होता है, ये बनारस की फिल्मी कहानी ही है। ये शुरू होती है हल्के फुल्के माहौल के साथ और तमाम उतार चढ़ाव से होते हुये एक सुखद अंत की तरफ बढ़ते जाती है। कहानी 3 दोस्तों की है , जिनकी पहली मुलाक़ात से लेकर किताब के अंतिम पन्ने तक की कहानी इन्ही तीनों के इर्द गिर्द घूमती रहती है। कहानी मे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विधि संकाय के पात्रों के माध्यम से विश्वविद्यालय का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया गया है। जिस तरह छात्रावास के भीतर की मौज मस्ती , षड्यंत्र और राजनीति के बीच मे लेखक द्वारा पिरोई गई है वो लेखक की लेखन कला की विशेषता ही है। एक काफी मज़ेदार कहानी जो आपको शुरू से अंत तक किताब के पन्नों से बांधे रहेगी। और एक बार जो आपने शुरुआत कर दी, फिर तो पुस्तक खत्म करने के पहले रूक पाना संभव बिलकुल भी नहीं है। लेखक सत्य व्यास,जो की विधि संकाय के मेरे अग्रज हैं, उन्हे ढेरों शुभकामनायें। भविष्य मे ऐसी ही कृति की आस अवश्य रहेगी।

पुस्तक का नाम - बनारस टॉकीज
लेखक - सत्य व्यास
शैली-  काल्पनिक ( फिक्शन)
प्रकाशक - हिन्द-युग्म , 1, जिया सराय, हौज खास , नई दिल्ली - 100032
प्रथम संस्करण - 2015

Wednesday, January 7, 2015

भारतीय सेकुलरिज़्म की अनोखी दास्तान : एक तरफा सेकुलरिज़्म

आते जाते , उठते बैठते अक्सर ही किसी न किसी को सेकुलरिज़्म पर ज्ञान देते सुनता हूँ। आज से ही नहीं, जब से होश संभाला हैं तब से इस सेकुलरिज़्म की परिभाषा गढ़ते हर रोज़ कोई न कोई सामने आ ही जाता है और फिर लगता है बिन मांगे अपना ज्ञान बाँचने। ऐसा लगता है ये सेकुलरिज़्म ही देश के सभी समस्याओं का एकलौता समाधान है। गरीबी कैसे हटेगी ये सेकुलरिज़्म ही बताएगा। देश के बेरोजगारों के लिए रोजगार की व्यवस्था ये सेकुलरिज़्म ही करेगा। किसी को दिन मे दो जून की रोटी मिले न मिले, सेकुलरिज़्म से ही उसके भूख की ज्वाला को मिटाया जा सकता है।
वैसे सेकुलरिज़्म का शाब्दिक अर्थ धर्मनिरपेक्षता होता है, अर्थात विभिन्न धर्मों एवं पंथों के बीच बिना किसी प्रकार के भेद भाव का व्यवहार। लेकिन भारत के परिपेक्ष्य मे भारतीय राजनीतिज्ञों एवं मीडिया के एक खास वर्ग ने इस सेकुलरिज़्म शब्द की अपनी ही व्याख्या करी हुयी है और इसी को रटते हुये इनके दिन गुज़र रहे हैं। इनके अनुसार एक खास समुदाय के ऊपर ही इस सेकुलरिज़्म का सारा बोझ है और उसी समुदाय को इस सेकुलरिज़्म की गाड़ी को अकेले खीचना है। दूसरे किसी समुदाय का कोई भी आचरण सेकुलर हो या न हो उसकी आवश्यकता ये जरूरी नहीं समझते। इस सेकुलरिज़्म के नाम पर बहुतों की दुकान चल रही है और इनकी कोशिश है की ये ऐसी ही चलती रहे। पर ये कब तक चलेगी ये देखने की बात है।
अभी हाल मे पीके फिल्म मे हिन्दू धर्म की कई मान्यताओं के ऊपर प्रहार हुआ जिसे ये खास सेकुलर लोग रचनात्मकता के दृष्टिकोण से देखते हैं लेकिन अगर यही रचनात्मकता का उपयोग किसी और संप्रदाय पर होता है तो सेकुलरिज़्म की दुहाई देते हुये यही लोग उसे धर्म पर प्रहार और धार्मिक भावनाए आहत होता हुआ देखते हैं।
एक तरफा सेकुलरिज़्म की एक और ताज़ा मिसाल हाल ही मे जम्मू कश्मीर विधान सभा चुनाव के परिनामों के बाद देखने को मिली जब भाजपा ने एक हिन्दू मुख्यमंत्री की बात करी तो तमाम राष्ट्रीय और कश्मीर के क्षेत्रीय दलों ने इसे कश्मीरियत पर हमला मानते हुये इसे खारिज कर दिया और दलील दी की हिन्दू मुख्यमंत्री वहां की बहुसंख्यक समुदाय से ताल्लुक नहीं रखता इसलिए ऐसी कोई भी संभावना को साकार होते वो नहीं देखना चाहते। अपनी सेकुलरिज़्म की परिभाषा इन दलों ने एक समुदाय विशेष के तुष्टीकरण के लिए बना रखी है। लेकिन क्या सेकुलरिज़्म का सारा दारोमदार एकतरफा होना चाहिये क्या? मेरा मानना है की ये एकतरफा सेकुलरिज़्म अत्यंत ही खतरनाक है और ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। लंबे दौर मे ऐसी एकतरफा सेकुलरिज़्म कभी कारगर सिद्ध नहीं हो सकती और सभी पक्षों को इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचने और विचार करने की ज़रूरत है।

चित्र - साभार श्री मनोज कुरील


Wednesday, December 31, 2014

एक और साल गुज़र रहा है ...

समेट कर न जाने कितनी यादें अपने आँचल मे , ये देखो एक और साल गुज़र रहा है।
कुछ खट्टी , कुछ मीठी और कुछ  चटपटी यादों से भरपूर एक और साल
कभी हंसी , कभी खुशी , तो कभी ग़म के माहौल से भरा रहा एक और साल
इन सभी पलों को अपने आँचल मे समेट कर, ये देखो एक और साल गुजर रहा है।

कुछ अनसुनी कुछ अनकही बातें भी समेटे है ये साल ,
कभी नम आँखों मे आँसू भी समेटे है ये साल,
किसी की हंसी के कारण को समेटे है ये साल,
इन सभी पलों को अपने आँचल मे समेट कर , ये देखो एक और साल गुज़र रहा है।

किसी ने देखी सफलता की नई ऊँचाइयाँ ,
किसी को विषमताओं से उबरने मे उलझाए रहा ये साल।
किसी को पल पल रही अपने प्यार की तलाश ,
तो किसी के प्यार ने उसे ढूंढ ही लिया अनायास।
इन सभी पलों को अपने आँचल मे समेट कर , ये देखो एक और साल गुज़र रहा है।



Sunday, September 14, 2014

हिन्दी दिवस पर ही हिन्दी को सम्मान क्यू ?


14 सितंबर को हर वर्ष देश मे जगह जगह हिन्दी दिवस मनाया जाता रहा है। हर वर्ष की तरह आज भी बड़े बड़े लोग, राजनीतिज्ञ , हिन्दी भाषा के विभिन्न स्वघोषित पुरोधा और सामाजिक कार्यकर्ता बड़े ही जोश के साथ जगह जगह हिन्दी को सम्मान दे रहे हैं और हिन्दी भाषा के विकास और प्रचार प्रसार के बारे मे अपना ज्ञान दे रहे हैं। टीवी के हिन्दी खबरिया चेनेलो पर तो सुबह से विभिन्न सेमिनार और सम्मेलन किए जा रहे हैं। लेकिन मुद्दा ये है की क्या आज के बाद इनमे से 10 प्रतिशत लोग भी हिन्दी के सम्मान के लिए अगले 14 सितंबर तक चर्चा करेंगे ? इसका जवाब बड़े बड़े अक्षरों मे 'नहीं' है। खबरिया चैनल की एक दिन की टीआरपी का जुगाड़ हो गया और इनमे बोलने वालों को भी एक दिन के लिए थोड़ा स्क्रीन स्पेस मिल गया। लेकिन क्या सिर्फ एक दिन चर्चा कर लेने भर से ही हिन्दी का सम्मान हो जाता है? क्या साल मे एक दिन हिन्दी भाषा को सम्मानित कर देने भर से हिन्दी भाषा के प्रति हमारा कर्तव्य समाप्त हो जाता है ? अगर हिन्दी को सम्मान देने के लिए हमे एक खास दिन पर निर्भर होना पड़े तो हिन्दी का इससे बड़ा अपमान शायद ही कुछ और हो।
आखिर क्यूँ हिन्दी भाषा को सम्मान देने के लिए हमे एक खास दिन पर निर्भर होना पड़ता है। क्या साल के बाकी दिन हम हिन्दी को सम्मान नहीं दे सकते। अगर हम संकल्प लें कि कि हम थोड़ा थोड़ा ही सही लेकिन प्रतिदिन हिन्दी के सम्मान के लिए कुछ काम करेंगे तो ये बहुत भारी काम नहीं है। हिन्दी विश्व की दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है और हिन्दी भाषा को इसका उचित सम्मान अगर हम हिंदुस्तानी नहीं देंगे तो बाकी कोई नहीं दे पाएगा। आइये सभी मिल कर संकल्प लें की हिन्दी को इसका सम्मानजनक स्थान अपने दैनिक कार्यक्रमों मे देने की कोशिश करेंगे और अगर कोशिश ईमानदार रूप से की जाए तो हिन्दी भाषा को हम इसका यथोचित स्थान तक पहुचाने मे अपना सहयोग दे पाएंगे।
कुछ वर्षों पहले जब मैंने अपना ब्लॉग लिखने का मन बनाया तो मैं काफी असमंजस मे था की संवाद की भाषा क्या रखु , हिन्दी या अँग्रेजी। काफी सोच विचार कर के ये निश्चय किया की संवाद का माध्यम हिन्दी भाषा ही रहेगी और आज भी मैं ब्लॉगिंग के लिए हिन्दी भाषा का ही प्रयोग कर रहा हूँ। हो सकता है मेरे लिखने मे काफी त्रुटि रहती होगी, बीच बीच मे मैं अँग्रेजी के कुछ शब्दों का भी प्रयोग करता रहा हूँ। लेकिन कोशिश हमेशा रहती है कि हिन्दी भाषा की अपने शब्दावली का ज्ञान वर्धन करूँ। और कोशिश आज भी लगातार जारी है। आप भी कुछ ऐसा ही संकल्प लीजिये और हिन्दी के सम्मान के लिए आप जितना सहयोग कर सकते हैं कीजिये। हिन्दी के सम्मान के लिए एक खास दिन पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए।



Friday, September 5, 2014

भारत के मीडिया को एक खुला पत्र

 नरेंद्र मोदी सरकार के 100 दिन पूरे होने पर सभी मीडिया चैनल और संगठित विपक्ष ने मोदी सरकार के 100 दिन का रिपोर्ट कार्ड पेश किया। स्वतंत्र भारत के पिछले 65 साल के इतिहास मे कभी भी मीडिया ने किसी भी केंद्र सरकार के महज 100 दिन पूरे होने पर रिपोर्ट कार्ड पेश करने का अतिउत्साह नहीं दिखाया था। जबकि श्री नरेंद्र मोदी ने प्रधान सेवक बनने के बाद अपने पहले अभिभाषण मे ही 5 साल के कार्यकाल के बाद अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करने की घोषणा कर चुके हैं और जाहिर तौर पर जब देश की जनता ने सरकार को 5 साल के लिए प्रचंड बहुमत दिया है तो देश की मीडिया को भी अपने इस जनादेश का सम्मान करते हुये सरकार को रिपोर्ट कार्ड मे उलझाने की बजाय जनकल्याण की योजनाओं के प्रसार मे अपना सकारात्मक समर्थन देने की जरुरत है।
 लेकिन जब 100 दिन के कार्यकाल पर रिपोर्ट कार्ड पेश करने की इतनी ज्यादा उत्सुकता मीडिया और विपक्ष के बीच उपज ही गई है तो देश के एक ज़िम्मेवार नागरिक होने के नाते मैंने भी मोदी सरकार के 100 दिन के कार्यकाल पर अपने स्वछंद विचार प्रस्तुत करने के लिए इस ब्लॉग पोस्ट का सहारा लेने की ज़रूरत समझी।
16 मई को देश की जनता ने अपना जनादेश देते हुये स्पष्ट कर दिया था की इस बार जनता को एक स्वतंत्र सोच वाली और बिना किसी बाधा  के काम करने वाली एक प्रचंड बहुमत की सरकार चाहिए थी। देश की जनता ने श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व मे काम करने के लिए भाजपा को 272+ के जादुई आंकड़े तक पहुचा दिया था और देश को एक ऐसा जनादेश दिया था जो एक मजबूत और कठोर फैसले ले सकने वाली सरकार के गठन की ओर बढ़ी थी। इस प्रचंड बहुमत देने के पीछे जनता के बीच पिछली सरकारों के प्रति गुस्से का भाव स्पष्ट प्रतीत हो रहा था। और जैसा की अनुमान था नरेंद्र मोदी के नेतृत्व मे सरकार बनने के तुरंत बाद से ही सरकार ने फ्रंट फूट पर आ कर वो सभी ज़रूरी फैसले लिए जो देश की ध्वस्त हो चुकी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए आवश्यक थे, जिनमे रेल के यात्री किरायों मे बढ़ोतरी जैसे कठोर फैसले तक शामिल थे। कांग्रेस के नेतृत्व मे मनमोहन सिंह की पिछली सरकार ने नई सरकार को ध्वस्त हो चुकी अर्थव्यवस्था, न्यूनतम विकास दर और आसमान छूती महंगाई विरासत मे दी थी, लेकिन सरकार ने अपने सुधार कार्यक्रमों और पॉलिसी फेरबदल से काफी जल्दी ही इन सभी पर काबू पा लिया।
पेट्रोल के दामों मे भारी गिरावट, देश की विकास दर मे अप्रत्याशित बढ़ोतरी और दूरगामी परिणाम वाले कई फैसले कर के सरकार ने अपने आने वाले 5 साल के क्रियाकलापों की झलक महज 100 दिनो मे दिखा दी है और देश के जन जन मे ऐसे उम्मीद जागी है की आने वाले 5 सालों मे देश अवश्य ही विकास के प पर आगे बढ़ेगा। महज 100 दिनो के कार्यकाल के भीतर प्रधान मंत्री जन धन योजना शुरू की गई जिसका मुख्य उद्देश्य वित्तीय रूप से उपेक्षित गरीब जनता को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना है और जिसके पहले दिन ही 1.84 करोड़ बैंक अकाउंट खोले गए जिसका सीधा फादा देश की गरीब जनता को मिला है। इसी बैंक अकाउंट के माध्यम से 1 लाख का बीमा और सीमित कर्ज की सुविधा भी आने वाले दिनों मे जनता को दी जाएगी। ऐसे ही कई और दूरगामी परिणाम वाले फैसले मोदी सरकार द्वारा लिए गए हैं जिनमे गंगा सफाई , स्मार्ट सिटि का विकास, डिजिटल इंडिया जैसा महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट, राज्यमार्गों का बेहतर रखरखाव और नए राज्यमार्गों का निर्माण जैसे महत्वपूर्ण फैसले शामिल हैं।
देश के साथ साथ सरकार ने वर्षों से शिथिल पड़ी अपनी विदेश नीति मजबूत करने का भी फैसला किया और मोदी जी भूटान , नेपाल और जापान जैसे पड़ोसी देशों की यात्रा कर आपसी संबंधों को सुदृढ़ बनाने की दिशा मे काफी आगे बढ़ रहे हैं। सार्क देशों के लिए अपना स्वयं का उपग्रह की योजना बना कर मोदी जी ने वसुधे कुटुंबकम की भारतवर्ष की प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया है। नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देशो के साथ भागीदारी को आगे बढ़ाने के क्षेत्र मे भी आगे बढ़ते हुये मोदी जी ने सर्वप्रथम दोनों देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों को आगे बढ़ाया और इनके विकास मे भी भागीदारी का भरोषा दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों को वह जा कर दिया। जापान जा कर मोदी जी ने भारत के विकास मे जापान की भूमिका का भी व्याख्या की और आने वाले वर्षों मे जापान के सहयोग से भारत मे अनेकों परियोजनाओं की नीव भी रखी। काशी की प्राचीनता को बरकरार रखते हुये इसके विकास का खाका भी खीचा और गंगा शुद्धिकरण के प्रति सरकार की गंभीर मंशा भी जाहीर की। पाकिस्तान द्वारा बार बार यूद्धविराम का उल्लंघन करने पर सेना को भी उचित जवाब देने की छुट दी गई। पिछले 100 दिनों के कार्यकाल से सरकार ने ये स्पष्ट कर दिया है की देश के विकास के हर पहलू को उचित स्थान दिया जाएगा और साथ ही साथ सामरिक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर भी सरकार उचितफैसले लेती रहेगी। एक आम नागरिक सरकार के 100 दिन के कार्यकाल से खुश है और उसे इन 100 दिनों मे देश के आने वाले 5 सालों की झलक मिल गई है। उम्मीद है मीडिया भी अपने पूर्वाग्रह से उबरेगा और सरकार के कदमों की न सिर्फ सराहना करेगी बल्कि लोकतन्त्र के एक मजबूत स्तम्भ की तरह भूमिका अदा करते हुये खुद भी इस विकास के रथ मे योगदान अगर न भी दे तो कम से कम समाज मे गलत संदेश तो नहीं प्रचारित करेगी।

चित्र-  साभार श्री मनोज कुरील 

Wednesday, August 6, 2014

भारत के शीर्ष कार्टूनिस्ट , कार्टूनिस्ट प्राण को एक श्रद्धांजलि ।

मशहूर कार्टूनिस्ट प्राण साहब को न जाने ऐसा शायद ही कोई होगा मेरी पीढ़ी या उसके पहले की पीढ़ी मे। हमारा तो पूरा बचपन ही प्राण साहब की रचनाओं के बीच गुजरा है। जितनी उत्सुकता चाचा चौधरी, साबू जैसे चरित्रों ने पैदा की उतनी शायद ही उन दिनों मे किसी और चीज़ को देख या सुन कर होती रही होगी। आज प्राण साहब हमारे बीच नहीं रहे तो बरबस ही बचपन के दिनो की एक घटना मेरे दिमाग मे कौंध गई। इसी घटना का वृतांत सुनाकर मैं प्राण साहब को अपनी तरफ से श्रद्धांजलि प्रस्तुत करना चाहता हूँ। अब ये प्रयास सफल रहती है या विफल ये आप लोग स्वयं निश्चित करें।

बात तब की है जब मैं तकरीबन 8 या 9 साल का था। स्कूल से लौटने के बाद काफी समय चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू इनके हीं बीच गुजरता था। एक दिन ऐसे ही एक दोपहर मे चाचा चौधरी की कॉमिक्स मे पढ़ा की जब साबू को गुस्सा आता है तो कहीं ज्वालामुखी फटता है। मैंने पढ़ा तो कई बार था इस लाइन को लेकिन उस दिन काफी उत्सुकता हुई ये जानने की आखिर ये ज्वालामुझी फटता कहाँ हैं। बाल मन परेशान था की किससे पूछूं ये रहस्य की ज्वालामुखी कहाँ फटता है? फिर क्या था पापा के ऑफिस से वापस आने का इंतज़ार करने लगा और जैसे ही पापा दिखे दौड़ कर उनके पास गया और उन पर सवाल दाग दिया की जब साबू को गुस्सा आता है तो ज्वालामुखी कहाँ फटता है? पापा ने भी 1 सेकंड के लिए सोचा की ये सवाल एकाएक कहाँ से दाग दिया गया उनके ऊपर और फिर उन्होने एक झन्नाटेदार थप्पड़ मेरे गाल पर जड़ दिया। मुझे पता चल चुका था की ज्वालामुखी कहाँ फटता है। उम्मीद है आप भी समझ गए होंगे।


चित्र- साभार श्री मनोज कुरील

Saturday, July 19, 2014

उत्तर प्रदेश मे व्याप्त जाने ये कैसा समाजवाद ?

भारत के स्वधिनता संग्राम के एक मजबूत स्तम्भ राम मनोहर लोहिया ने समाजवाद की परिकल्पना इस उद्देश्य से करी थी की समाज के आखिरी छोर तक खड़े गरीबों , दलितों को समाजिक विकास की अगली पंक्ति मे ला कर सभी वर्गों के साथ कंधे से कंधे मिला कर चलने योग्य बनाया जाएगा। लेकिन लोहिया के चेलों ने जाने लोहिआ से समाजवाद की कौन सी शिक्षा ली थी जो आज के उत्तर प्रदेश मे परिलक्षित हो रही है। ये लोहिया के शिक्षा की विफलता तो बिलकुल ही नहीं हो सकती, वरन ये उनके शिष्यों के समाजवाद के समझ की ही विफलता है। समाजवाद की जो परिकल्पना लोहिया जी ने की थी वो तो उनके साथ ही इस दुनिया से चला गया और मुलायम जैसे लोग उस समाजवाद की आत्मा को तड़पा भर ही रहे हैं। आज हमारे उत्तर प्रदेश मे गरीबों, दलितों और महिलाओं पर हो रहा अत्याचार समाजवाद की परिभाषा मे तो नहीं आता। ये लोहिया का समाजवाद नहीं, परंतु उनके चेलों का सीखा हुआ असमाजवाद ही हो सकता है। 
लोहिया से शुरू हुई समाजवाद की परिकल्पना आज समाजवाद के स्व्घोषित पुरोधा मुलायम के परिवार की दहलीज पर दम तोड़ चुका है। मुलायम ने आज समाजवाद को पारिवारिक जामा पहना कर महज एक परिवारवाद बना दिया है। लोहिया जी ने समाजवाद की परिकल्पना समाज के अंतिम छोर तक मौजूद लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने की थी, परंतु उनही राम मनोहर लोहिया के शिष्य मुलायम सिंह यादव ने उनके समाजवाद के दिव्य स्वपन को अपने द्वारा बनाए हुये परिवारवाद के पैरों कुचल दिया है।
लोहिया तो राजनीति की गंदी गली में भी शुद्ध आचरण की बात करते थे। लेकिन आज का मुलायम का समाजवाद तो उनके इस विचार से कोसों दूर दिखाई पड़ता है। शुद्ध आचरण की बात ही आज की समाजवाद मे बेमानी है। आज उत्तर प्रदेश का कोना कोना मुलायम के असमाजवाद के जहर को घुट घुट के पी रहा है। आज उत्तर प्रदेश की निरंकुश सरकार को जनता की परेशानियों से कोई मतलब नहीं है। इनहोने जनता की लाश कुचल कर परिवारवाद को आगे बढ़ाया है।इस असमाजवाद के बर्बर और निरंकुश रूप को देख कर कहीं न कहीं लोहिया की आत्मा भी अवश्य ही रोज़ तड़प उठती होगी। आज इस असमाजवाद से इस प्रदेश को सिर्फ राष्ट्रवाद ही बचा सकता है। सभी राष्ट्रवादियों को मिल कर इस असमाजवाद को उखाड़ फेकना ही होगा।



Tuesday, July 8, 2014

वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।

जहां महिलाएं बलात्कार के बाद पेड़ पर लटकाई जाती हैं, वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां मंदिरों के स्पीकर उतार दिये जाते हैं एक संप्रदाय के तुष्टीकरण के लिए, वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां तमाम आपराधिक प्रवृती के लोग बड़े बड़े पदों पर आसीन हैं , वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहा एक संप्रदाय विशेष का तुष्टीकरण अपने चरम पर है , वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहा युवा बेरोजगारी के दिन गुजारने पर विवश है, वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां बच्चों के शिक्षा की कोई भी व्यवस्था नहीं है, वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां कुम्भ मेला के आयोजन मे करोड़ों का गोलमाल किया जाता है, वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां के विश्वविद्यालयों मे पठन पाठन के अलावा बाकी सारे कार्य निर्बाध रूप से हो रहे हैं, वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां अपराध का स्तर तमाम ऊंचाइयों को प्राप्त कर रहा है , वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां तमाम औद्योगिक इकाइयां बंद होने पर विवश हैं, वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां महिलाएं सूरज ढलने के बाद अकेले घरों से निकलने मे हिचकिचाती हैं, वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां सड़कों की हालत एक ही बारिश मे बद से बदतर हो जाती है, वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां सरकारी कार्यालयों मे बिना चढ़ावा कोई काम नहीं होता , वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जहां बिजली का जाना नहीं बिजली का आना समाचार बन जाता है , वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।
जो राज्य अंधेर नागरी और चौपट राजा का सबसे बड़ा उदाहरण है , वो उत्तर प्रदेश मूलायम को 'उत्तम प्रदेश' दिखता है।