दिल्ली से ट्रेन द्वारा मुंबई सेंट्रल पहुँचने और वहाँ से लोकल और रिक्शा का सफर कर के मित्र के आवास तक पहुँचने का व्याख्यान तो मैंने अंतिम पोस्ट के द्वारा बता ही दिया था। वहाँ पहुच कर मैंने सबसे पहले आरामदायक बिस्तर की ओर रुख किया और बिस्तर पर पड़ते ही नींद ने मुझे अपनी आँचल मे छिपा लिया। दोपहर मे नींद खुली तो स्नान भोजन वगैरा कर के सोचा की अब क्या किया जाये? साथ मे ही बैठे मित्र ने झट सुझाव दिया की शाम को गेटवे ऑफ इंडिया देखने चल सकते हैं, बगल मे ज़ू है,वहाँ जाया जा सकता है और भी अनगिनत सुझाव जैसे बैंडस्टैंड,जुहू चौपाटी और न जाने क्या क्या। मैंने कहा वो सब तो ठीक है उसके पहले ज़रा मुंबई की शराब चख ली जाए तो उसमे कोई बुराई है क्या? इतने दिनो बाद मिल रहे हैं तो पहले थोड़ा शराब, कबाब का कार्यक्रम कर लेते हैं, रही बात घूमने की तो वो भी कर लेंगे। मेरे इस विचार को उन्होने भी हाथों हाथ लिया और सहमति जताते हुये कहा कि मेरा ऊसुल तो तू जानता ही है, कि जब तक सूरज ढलता नहीं तब तक मैं मदिरा को हाथ भी नहीं लगाता। मैंने कहा जी ठीक है, जैसे आप कहे,ऊसुल है तो ऊसुल है। फिर मैंने कहा कि जी आपको भी मेरा एक ऊसुल पता ही है , तो वो बोले क्या? मैंने कहा जी "सूरज अस्त तो ठाकुर साहब मस्त"। फिर सहमति हुई और शाम को वृद्ध साधु (ओल्ड मोंक) की बोटल के साथ उपवास तोड़ा और कॉलेज के हॉस्टल वाले दिनो को याद करते हुये जाम टकराए।
ओल्ड मोंक पीने का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट ये है की इससे हैंगओवर होने के चांसेज बड़े ही कम रहते हैं।इसलिए सुबह जब नींद खुली तो सब कुछ फ्रेश फ्रेश था। खैर कुछ काम था, तो सोचा पहले वो निपटा लिया जाए।स्नान ,नाश्ता सब कर के फ्लॅट से नीचे उतरा और रिक्शा ले के अंधेरी की तरफ निकल गया।रिक्शावाला समझ गया की ये भाई साहब जो हैं बाहर से आए हैं इसको घूमा लो जितना घूमाना है।9 किलोमीटर की दूरी तय करने मे उस रिक्शावाले को 14 किलोमीटर लग गए और जब उसके बाद जब मैंने उससे बोला की भाई तुझे नहीं लगता की तू कुछ ज्यादा ही गोल चक्कर लगा कर लाया है तो उसने मराठी मे कुछ बोलते हुये कहा की इतना ही होता है।खैर मैंने उससे बहस न करने मे ही भलाई समझी और उसके पैसे उसे दे कर गंतव्य की ओर रवाना हो लिया।
शाम को जब वापस आना हुआ तो मैंने सोचा की क्यू न लोकल ट्रेन का विभत्स रूप जैसा की फिल्मों मे देखा है और सुना है उसके दर्शन कर लिए जाएँ। तो मैंने अंधेरी से लोकल ट्रेन पकड़ने की सोची। अंधेरी पहुंचा तो देखता हु टिकट लेने के लिए लंबी लाईन लगी है। मैंने सोचा इसमे लगा तो टिकट शायद कल ही मिल पाएगा, तभी किसी ने बताया की टिकट के अलावा कूपन की भी व्यवस्था होती है,आप वो भी ले सकते हो,मुझे कूपन वाला ऑप्शन ज्यादा सही और समय बचने वाला लगा। झट से कूपन लिया और एक राहगीर की सहयोग से उसे इस्तेमाल करने का तरीका जान कर प्लैटफ़ार्म की ओर प्रस्थान कर दिया। प्लैटफ़ार्म तक पहुचने मे ही खासे मसक्कत का सामना करना पड़ा। कहने को तो फूट ओवर ब्रिज से प्लैटफ़ार्म पर जाने के लिए सीढ़ियों की बजाए आरामदायक स्लोप बनाए गए हैं, लेकिन उसकी चौड़ाई मे रेल्वे ने थोड़ी कंजूसी कर दी है, अगर स्लोप की चौड़ाई थोड़ी और रहती तो लोगो को थोड़ा और आराम मिल जाता। खैर किसी तरह प्लैटफ़ार्म पहुंचा तब पता चला की फिल्मों मे जो देखा है वो किसी हद तक गलत नहीं था। एक पूरा जनसैलाब नीचे ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था।वैसे तब तक एक जानकारी और प्राप्त हुयी कि लोकल भी 2 प्रकार की होती हैं, एक स्लो लोकल जो की हर स्टेशन पे रुकते हुये जाती है और दूसरी फास्ट लोकल जो गिने चुने स्टेशन पे ही रुकती है।ये जानकारी काफी उपयोगी साबित हुयी मेरे लिए अन्यथा मैं स्लो लोकल के चक्कर मे स्लोली ही घर पहुंचता।
तब तक फास्ट लोकल के आने का पता चला तो मैं भी इसमे चढ़ने के लिए कमर कस ली। जल्दी ही ट्रेन आई और उतरने वाले यात्रियों की भीड़ ने ऐसा धक्का लगाया की मैं उनके साथ ही पीछे हो गया। खैर पहले ट्रेन मे चढ़ पाने मे तो मुझे कामयाबी नहीं मिली लेकिन मैंने भी ठान लिया की अगली लोकल मे तो फतह कर के रहूँगा।खैर अगली वाली लोकल मे किसी तरह चढ़ भी गया लेकिन जनता ने अगले स्टेशन पे अपने साथ साथ धक्का दे के मुझे भी उतार दिया।किसी तरह दुबारा चढ़ा और बोरीवली स्टेशन पहुंचा। लोकल के इस आधे घंटे के सफर ने पूरे शरीर का मसाज कर दिया।
बाकी बचे दो दिनो मे मुंबई,ठाणे के विभिन्न जगहों का भ्रमण किया और 2 दिनो के बाद पुनः मुंबई सेंट्रल से दिल्ली के लिए ट्रेन बोर्ड किया और वापस दिल्ली आ गया।दिल्ली आ कर काफी सुकून मिला और मेट्रो ट्रेन कि भीड़ ने मुंबई लोकल कि यादें ताज़ा कर दी।
ये ब्लॉग एक प्रयास है देश, दुनिया मे चल रही समसामयीक घटनाओ पर अपने विचार प्रस्तुत करने का। कुछ की नज़र मे ईमानदार, कुछ की नज़र मे समझदार, कुछ की नज़र मे बौद्धिक तो कुछ की नज़र मे बेकार। आस पास की घटनाओं पर पैनी नज़र जारी रहेगी और लिखता रहूँगा बेबाकी से। किसी की भावनाएं आहत न हो इसका पूरा प्रयास। लेकिन राष्ट्रवादी विचारधारा से कोई समझौता नहीं। मेरा प्रयास जारी रहेगा,और आपका बहुमूल्य सहयोग मिलेगा,यही उम्मीद करता हूँ।
Friday, February 22, 2013
Tuesday, February 19, 2013
मुंबई से मेरा पहला साक्षात्कार पार्ट 1
जैसा कि आप लोग जानते ही हैं मुझे अलग अलग जगहों को एक्सप्लोर करने का एक शौक है। इसी शौक और कुछ निजी काम के चलते पिछले दिनो मुंबई जाने का मौका भी मिला। मौका मिला था तो उसे मैंने झटकते हुये मुंबई की टिकिट्स करा ली। दिल्ली से राजधानी एक्सप्रेस की सुखद 16 घंटे की यात्रा कर के सुबह सुबह मुंबई सेंट्रल स्टेशन पहुंचा। पहली बार मुंबई गया था तो मन मे काफी सारी आशंकाए और एक प्रकार की झिझक भी भरी हुयी थी। हमारे एक परम मित्र साहब इस बात से भली भांति परिचित हैं,और मुंबई मे ही रहते हैं। मैंने उनसे गुजारिश की थी की आप स्टेशन आ जाए तो मेरे लिए बड़ा भला होगा क्यूंकी जिस मुंबई की छवि मैंने फिल्मों और न्यूज़ वगैरह मे देखी और महसूस की हैं अगर प्रथम दृष्टतया उस पर भरोसा करूंगा तो मैं तो शायद लोकल ट्रेन मे चढ़ने मे भी कामयाब न हो पाऊँ। खैर उन्हे भी इस बात का अंदेशा था इसलिए उन्होने झट ही मेरे आग्रह को स्वीकार किया और मुझसे कहा की वो स्टेशन पहुंच जाएंगे।मेरे स्टेशन पहुँचने के बाद मित्र के आने मे थोड़ा विलम्ब था तो मैंने सोचा तब तक स्टेशन का ही मुआयना कर लिया जाए।आगे बढ़ कर स्टेशन के वेटिंग एरिया मे पहुंचा तो स्टेशन की स्थापत्य कला को देख कर आराम से अंदाज़ा लगाया जा सकता था की अंग्रेज़ो के जमाने मे बना ये स्टेशन सालों की उम्र बिता कर आज भी दृढ़ता के साथ खड़ा है।सीसीटीवी कैमरे निगरानी मे लगे थे लेकिन कितनी निगरानी कर रहे थे इसके बारे मे अंदाज़ा लगाना मुश्किल था।अभी चाय की चुस्की ली ही थी कि मित्र का फोन आ गया कि वो आ गए हैं।खैर चाय खतम कि और फिर उसके साथ हो लिया। मित्र ने बताया कि अब हमे लोकल ट्रेन कि यात्रा करके बोरीवली पहूँचना होगा और वहाँ से रिक्शा से उसके निवास स्थान जाना होगा। लोकल का सफर उतना दुखदायी नहीं था जितना मैंने उम्मीद लगाई थी। मित्र ने बताया कि अभी हम उल्टी दिशा मे जा रहे हैं इसलिए भीड़ कम है , शाम को उस ओर जाने के लिए एक जंग करना पड़ता है। हमने कहा चलो बढ़िया है ,जंग से तो बच गए , वैसे भी मैं तो शान्तिप्रिय इंसान हूँ,कहाँ जंग लड़ूँ अंजान शहर मे। बोरीवली उतर के बाहर निकले तो रिक्शा खड़ा नहीं दिखा, मैंने कहा कि आपने तो कहा था कि रिक्शा से चलना होगा तो उन्होने मेरे संदेह को दूर करते हुये बताया कि मुंबई मे ऑटो को ही रिक्शा कहा जाता है। मैंने कहा अच्छा है पर फिर रिक्शा को क्या कहते हैं तो वो हमारी बात को टाल गए।
खैर मुंबई के रिक्शा मे भ्रमण करते हुये निवास स्थान पहुच ही गए। रास्ते मे संजय गांधी नेशनल पार्क का विशाल दरवाजा भी देखने को मिला, मित्र ने बताया कि ये काफी बड़े एरिया मे फैला हुआ है और इससे सटे जो कई सारे कालोनिस हैं उनमे अक्सर ही चीते दिखाई दे जाते हैं जो जंगल से भटकते हुये अक्सर रिहायीशी इलाकों मे पहुंच जाते हैं। खैर इसमे उन बेजुबान जानवरों का कोई दोष नहीं है, हमने ही उनके जंगलों को काट काट के जो कालोनिया बना ली हैं तो इसमे उनका घर उन जानवरो से छीनता जा रहा है। एक बात बताना तो भूल ही गया कि स्टेशन से बाहर आते वक़्त मेरा मुंबई के विभिन्न उपनगरीय इलाको के साथ ईस्ट और वेस्ट जुड़े रहने का कान्सैप्ट क्लियर हो गया था।लोकल के स्टेशन के ईस्ट और वेस्ट स्थित होने से इलाकों के नाम रखे गए है।जैसे कि बोरीवली स्टेशन के ईस्ट उतरे तो वो इलाका बोरीवली ईस्ट हो गया और वेस्ट साइड उतरे तो बोरीवली वेस्ट।ये वो ज्ञान था जो मुझे बिना मुंबई गए नहीं मिल सकता था।
खैर घर पहुंचे तो सुट्टे कि तलब भी लग चुकी थी, फ्लॅट के नीचे ही दुकान थी। गया तो वहाँ पर भी 3-4 लोगो का जमघट लगा था और किसी मुद्दे पर गहन विचार चल रहा था। आवाज़ के मॉड्युलेशन से समझ गया कि ये सारे राजनीतिक विश्लेषक उत्तर प्रदेश से संबंध रखते हैं। मुंबई मे भी मायावती और मुलायम के मुद्दे पर गहन विचार विमर्ष का दौर चल रहा था, इससे पहले कि मैं भी उस विमर्श का हिस्सा बन जाता हमारे मित्र ने कहा कि सुट्टे के साथ ही कटिंग चाय कि चुस्की भी ले ली जाए। खैर मैंने और मित्र साहब ने सुट्टा जलाया और एक कटिंग चाय कि चुस्की ली और फिर फ्लॅट मे पहुच कर आराम करने के लिए आरामदायक बिस्तर कि गोद मे निंद्रा की छाँव मे चला गया।
॥क्रमशः॥
Wednesday, January 23, 2013
कहाँ हैं हिन्दू आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैंप ?
हमारे देश की सरकार में एक से बढ़ कर एक ज्ञानी मंत्री लोग हैं। पढ़े लिखे भले ही न हो, शैक्षिक योग्यता के नाम पर शायद दसवी या बारहवी पास ही होंगे मुश्किल से, लेकिन ज्ञान का अथाह खान हैं। आये दिन इनके बयान सुन कर रोज़ का लाफ्टर का खुराक मिल जाया करता है, लेकिन इस बार तो एक मंत्री साहब ने हद्द ही कर दी। ऐसा बयान जरी कर दिया जो खुद इनके पार्टी की ही गले की हड्डी बन गया है। इनकी खुद की पार्टी ने भी ये कहते हुए बयान से पल्ला झाड़ लिया है कि ये पार्टी का नहीं बल्कि मंत्री जी का व्यक्तिगत बयान है।
ये मंत्री जी जिनके ऊपर देश के आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी है , हमेशा से ये कहते आ रहे हैं की आतंक का कोई धर्मं नहीं होता, आतंकी सिर्फ एक विकृत मानसिकता का प्रतिरूप होते हैं, आतंकवादियों को किसी एक संप्रदाय या धर्मं विशेष से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। बिलकुल सही बात है हम सभी भारतवासी आतंक को सिर्फ आतंक ही समझते हैं। किसी धर्मं विशेष से इसे जोड़ना बिलकुल गलत और निंदनीय है। लेकिन अभी पिछले दिनों इन्ही मंत्री जी ने एक संवाददाता सम्मलेन में ये कह कर सबको अच्चम्भित कर दिया की देश में हिन्दू आतंकवादियों के टेरर कैंप चल रहे हैं। लो कर लो बात कल तक यही साहब सबको ज्ञान बाटते फिर रहे थे की आतंक का कोई धर्मं नहीं होता और अब खुद ही कह रहे हैं कि हिन्दुओं के आतंकवादी कैंप चल रहे हैं देश में। मतलब ये है की ज्ञान बटने में तो ये भाई साहब आगे हैं लेकिन खुद ही उस ज्ञान को अमल कर पाने में नाकाबिल। और तो और जब मंत्री जी ने कह ही दिया हिन्दू आतंकवादियों के कैंप चल रहे हैं तो पाकिस्तान के राजनेताओं ने इसी का फायदा उठाते हुए भारत को ही आतंकवादी राष्ट्र घोषित करने की सिफारिश कर दी। अब मेरे ये समझ में नही आ रहा की ये साहब देश के हित में काम कर रहे हैं ये देश के खिलाफ। वैसे मुझे तो ये शक भी है की मंत्री साहब ने ये बयान देशवासियों का ध्यान पाकिस्तान द्वारा हमारे दो सैनिकों के सर काटने का कारण उपजे विवाद से दूर करने के लिए दिया है, ताकि सरकार की कमजोरियों से जनता का ध्यान भंग हो कर इस मुद्दे पे आ जाये।
भाई साहब आप एक ज़िम्मेदार मंत्री हैं , ज़रूर सब कुछ सोच समझ कर ही बयान जारी किया होगा। तो इस देश के एक जिम्मेवार और देशभक्त नागरिक होने के नाते हम भी जानना चाहते हैं कि आतंक फ़ैलाने वाले इन हिन्दू आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैंप कहा चल रहे हैं। चलिए जिन आतंकवादियों के कैंप देश के बाहर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रहे हैं, उन पर कारवाई न कर पाने की आपकी मज़बूरी से हम वाकिफ हैं। देश के बाहर जा कर हम किसी भी प्रकार की करवाई कर पाने में असमर्थ हैं। लेकिन जैसा की आपने बताया की आपके पास ख़ुफ़िया जानकारी मौजूद है की देश में हिन्दू आतंकवादियों के कैंप चल रहे हैं, तो हम ये जानना चाहते हैं की जानकारी मौजूद होने के बावजूद आखिर सरकार उन कैम्पस पर हमला क्यों नहीं कर रही है? देश के लिए खतरा ऐसे कैम्पस को तुरंत नेस्तनाबुन्द कर देना चाहिए। और उन्हें प्रशिक्षण देने वालों के ऊपर राष्ट्रद्रोह के कानून के अंतर्गत कानूनी कार्यवाही करना चाहिए।
श्रीमान वोट बैंक की राजनीती तो आप लोग वर्षों से करते आ रहे हैं, और करते रहिये उससे हमे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन कम से कम देश की सुरक्षा के मामले में तो ऐसी ओछी राजनीती से ऊपर उठ कर बयान जारी किया कीजिये। अगर एक धर्म विशेष के 10 व्यक्ति किसी आतंकी घटना अंजाम देने में भागीदार होते हैं तो क्या सरकार की ओर से ऐसे गैर जिम्मेदार बयान देना उचित रहेगा की उस धर्मं के आतंकी प्रशिक्षण कैंप चल रहे हैं? भारत एक सेक्युलर देश है और आप लोग तो सबसे बड़े वाली स्वयं घोषित सेक्युलर पार्टी के नेतागण हैं, तो कृपया कर के ऐसे बयान जारी करने से पहले 'मेन्टोस' खा लिया कीजिये। जो दोषी है उन पर कारवाई करने की बजाये ऐसे अनुचित बयान जारी करना न सिर्फ निंदनीय है बल्कि ये सरकार में मौजूद लोगो की विकृत मानसिकता को उजागर करता है। अगर फिर भी न मानते तो हमारा क्या जाता है, हम तो 'मैंगो पीपल' हैं किसी तरह अपना गुजर बसर कर ही लेंगे। लेकिन अगर अब भी ऐसे बेसिर पैर वाले घटिया बयान जारी करते रहियेगा तो आने वाले चुनाव में जनता का जवाब आप लोगों को खुद ही मिल जायेगा। भगवान आको सद्बुद्धि दे, बस यही कामना कर सकता हूँ।
ये मंत्री जी जिनके ऊपर देश के आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी है , हमेशा से ये कहते आ रहे हैं की आतंक का कोई धर्मं नहीं होता, आतंकी सिर्फ एक विकृत मानसिकता का प्रतिरूप होते हैं, आतंकवादियों को किसी एक संप्रदाय या धर्मं विशेष से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। बिलकुल सही बात है हम सभी भारतवासी आतंक को सिर्फ आतंक ही समझते हैं। किसी धर्मं विशेष से इसे जोड़ना बिलकुल गलत और निंदनीय है। लेकिन अभी पिछले दिनों इन्ही मंत्री जी ने एक संवाददाता सम्मलेन में ये कह कर सबको अच्चम्भित कर दिया की देश में हिन्दू आतंकवादियों के टेरर कैंप चल रहे हैं। लो कर लो बात कल तक यही साहब सबको ज्ञान बाटते फिर रहे थे की आतंक का कोई धर्मं नहीं होता और अब खुद ही कह रहे हैं कि हिन्दुओं के आतंकवादी कैंप चल रहे हैं देश में। मतलब ये है की ज्ञान बटने में तो ये भाई साहब आगे हैं लेकिन खुद ही उस ज्ञान को अमल कर पाने में नाकाबिल। और तो और जब मंत्री जी ने कह ही दिया हिन्दू आतंकवादियों के कैंप चल रहे हैं तो पाकिस्तान के राजनेताओं ने इसी का फायदा उठाते हुए भारत को ही आतंकवादी राष्ट्र घोषित करने की सिफारिश कर दी। अब मेरे ये समझ में नही आ रहा की ये साहब देश के हित में काम कर रहे हैं ये देश के खिलाफ। वैसे मुझे तो ये शक भी है की मंत्री साहब ने ये बयान देशवासियों का ध्यान पाकिस्तान द्वारा हमारे दो सैनिकों के सर काटने का कारण उपजे विवाद से दूर करने के लिए दिया है, ताकि सरकार की कमजोरियों से जनता का ध्यान भंग हो कर इस मुद्दे पे आ जाये।
भाई साहब आप एक ज़िम्मेदार मंत्री हैं , ज़रूर सब कुछ सोच समझ कर ही बयान जारी किया होगा। तो इस देश के एक जिम्मेवार और देशभक्त नागरिक होने के नाते हम भी जानना चाहते हैं कि आतंक फ़ैलाने वाले इन हिन्दू आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैंप कहा चल रहे हैं। चलिए जिन आतंकवादियों के कैंप देश के बाहर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रहे हैं, उन पर कारवाई न कर पाने की आपकी मज़बूरी से हम वाकिफ हैं। देश के बाहर जा कर हम किसी भी प्रकार की करवाई कर पाने में असमर्थ हैं। लेकिन जैसा की आपने बताया की आपके पास ख़ुफ़िया जानकारी मौजूद है की देश में हिन्दू आतंकवादियों के कैंप चल रहे हैं, तो हम ये जानना चाहते हैं की जानकारी मौजूद होने के बावजूद आखिर सरकार उन कैम्पस पर हमला क्यों नहीं कर रही है? देश के लिए खतरा ऐसे कैम्पस को तुरंत नेस्तनाबुन्द कर देना चाहिए। और उन्हें प्रशिक्षण देने वालों के ऊपर राष्ट्रद्रोह के कानून के अंतर्गत कानूनी कार्यवाही करना चाहिए।
श्रीमान वोट बैंक की राजनीती तो आप लोग वर्षों से करते आ रहे हैं, और करते रहिये उससे हमे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन कम से कम देश की सुरक्षा के मामले में तो ऐसी ओछी राजनीती से ऊपर उठ कर बयान जारी किया कीजिये। अगर एक धर्म विशेष के 10 व्यक्ति किसी आतंकी घटना अंजाम देने में भागीदार होते हैं तो क्या सरकार की ओर से ऐसे गैर जिम्मेदार बयान देना उचित रहेगा की उस धर्मं के आतंकी प्रशिक्षण कैंप चल रहे हैं? भारत एक सेक्युलर देश है और आप लोग तो सबसे बड़े वाली स्वयं घोषित सेक्युलर पार्टी के नेतागण हैं, तो कृपया कर के ऐसे बयान जारी करने से पहले 'मेन्टोस' खा लिया कीजिये। जो दोषी है उन पर कारवाई करने की बजाये ऐसे अनुचित बयान जारी करना न सिर्फ निंदनीय है बल्कि ये सरकार में मौजूद लोगो की विकृत मानसिकता को उजागर करता है। अगर फिर भी न मानते तो हमारा क्या जाता है, हम तो 'मैंगो पीपल' हैं किसी तरह अपना गुजर बसर कर ही लेंगे। लेकिन अगर अब भी ऐसे बेसिर पैर वाले घटिया बयान जारी करते रहियेगा तो आने वाले चुनाव में जनता का जवाब आप लोगों को खुद ही मिल जायेगा। भगवान आको सद्बुद्धि दे, बस यही कामना कर सकता हूँ।
Sunday, January 20, 2013
इनकी माँ रोये तो ब्रेकिंग न्यूज़ बन गया, सारे देश की माएं भी तो रो रही हैं सालों से उनकी किसी को खबर भी नहीं...
एक परिवार है , पिछले 60-70 सालों से दबा के मज़े ले रहा है , और इतने मज़े लेने के बाद भी न जाने क्या क्या दुष्प्रचार किये जा रहा है। और इसके बाद भी जनता को विश्वास दिलाते आ रहा है की हमने देश के लिए ये खोया , वो खोया। सही में तुमने खोया? क्या बता रहे हो , अगर खोने का स्वाद इतना मज़ेदार होता है तो भाई साहब देश के वो अस्सी करोड़ लोग भी खोने तैयार हैं जिन्हें दो जून का भोजन भी नसीब नहीं होता। मजाक तक ठीक है लेकिन ऐसी दिनदहाड़े सफ़ेद झूठ हमसे बर्दाश्त नहीं होता रे भाई। आपसे हो जाता है तो कर लो साहब, लेकिन न तो हम बर्दाश्त करेंगे न ही इनका झूठ सुनेंगे।
एक खास राजनीतिक दल है, आज़ादी के 65 सालों में इन्होने 50 से ज्यादा सालों तक राज़ किया है इस देश पर। और उन सालों में एक खास परिवार ने 35 सालों के आस पास राज़ किया है , उसी परिवार का लड़का उस परिवार संचालित राजनीतिक दल का नया उपाध्यक्ष चुन लिया जाता है। गौरतलब है की उसकी अम्मा पिच्च्ले 15 सालों से उस खास दल की अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हैं, अब निर्वाचित हैं या जो भी हैं हम ज्यादा टिपण्णी कर नहीं सकते न ही करना चाहते। भाई तुम्हारी फॅमिली ओन्ड पोलिटिकल पार्टी है जो करना है करो लेकिन देश दुनिया को ये तो कह कह के गुमराह तो मत ही करो कि तुम लोगों ने देश के लिए ये किया, वो किया। किया तो तुमने अपने परिवार के अलावा किसी के पप्पा के लिए भी नहीं। इनके घर का कुत्ता भी इस देश के किसी साधारण व्यक्ति से ज्यादा सुविधाएं उठाता है, और ये मगरमच्छ वाले आंसू बहाते फिरते हैं की हमने ये खोया और वो खोया।
इस देश के जो अनपढ़ लोग हैं, या कम पढ़े लिखे लोग जो हैं वो तो अब तक इनको यही समझ के वोट देते आ रहे हैं कि ये महात्मा गाँधी के वंशज हैं। मेरे गाँव के भी जो वृद्ध लोग हैं या जो जवान भी है अधिकतम यही सोचते हैं की ये ही असली गाँधी हैं। कई बार समझाने की कोशिश की लेकिन नतीजा वोही ढाक के तीन पात। शायद 1997 या 1998 का साल था जब मैं महात्मा गाँधी के पोते से मिला था, वो उस समय भुवनेश्वर से गाँधी जी की अश्थियाँ ले कर लौट रहे थे पुरुषोत्तम एक्सप्रेस से। ट्रेन का सासाराम स्टेशन पर 4-5 मिनट का स्टॉप था, उस समय मैं वहां पर ही रहता था, तो मैं भी स्टेशन चला गया उनसे मिलने। तकरीबन 3-4 मिनट की मुलाकात में ही उन्होंने बताया की उनका परिवार साऊथ अफ्रीका में रहता है और वंही पर खुश हैं क्यूंकि उनकी जगह तो यहाँ किसी और ही परिवार ने ले रखी है। उस समय राजनीतिक रूप से इतना परिपक्व नहीं था इसलिए उनके कहने का मतलब नहीं समझ पाया था, लेकिन आज जब उनकी बातें याद आती हैं तो समझ में आता है की उनकी व्यथा गलत भी नहीं थी।
एक और बात कही भाई साहब ने आंसू बहाते हुए और चिट्टा पढ़ते हुए। गौर कीजियेगा बिना चिट्टा के न तो ये कुछ बोल पाते हैं न ही इनकी अम्मा जी, फिर भी सबसे बड़े वाले हिंदुस्तानी यही हैं। ठेका इनके और इनके परिवार के नाम ही हैं भारतीयता का। इनके परिवार से बड़ा देशभक्त तो शायद ना मंगल पाण्डेय रहे होंगे न ही रानी लक्ष्मी बाई और नहीं तात्या टोपे जी। इनके परिवार के आगे तो भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, राजगुरु, सुखदेव का भी नाम नहीं आने देते इनके पारिवारिक दल के कार्यकर्ता। हाँ तो मैं बता रहा था की इन साहेबान ने कहा क्या, भाई साहब व्याख्यान दे रहे थे की इन्होने जिसके साथ बैडमिंटन खेलना सीखा उन्हीने इनके सर से सब छीन लिया। सही में छीन लिया या दे दिया। भाई साहब इसका फैसला अब आप लोग ही कर लो की मज़े कौन ले रहा है और कौन सर से सब कुछ छीने जाने के कारण विवशता की जिंदगी जीने को विवश है।
एक बात तो बताना भूल ही गया की ये जो भाई साहब अगला प्रधान मंत्री बनने की ख्वाइश देख रहे हैं और खुद को युवा युवा करते नहीं थकते, इनकी उम्र इस देश के सबसे उम्रदराज़ युवा से तकरीबन 12 साल ही ज्यादा है। अब सिर्फ अगर शादी न हो तो बंदा युवा थोड़े ही रहता है। भाई साहब उम्र तुम्हारी खुद तुम्हारा साथ छोड़ते जा रही है और तुम खुद को युवा युवा करते जा रहे हो। हमारे तरफ तो अगर इस उम्र में किसी की शादी न हो तो लोग पता नहीं किस किस चिकित्सीय उपचार की सलाह दे देते हैं, लेकिन आप स्वयंभू युवराज हैं मजे लीजिये ज़िन्दगी के। और इतने ही युवा हो तो भाई साहब युवाओ के ऊपर हो रहे अत्याचार के विरोध में भी 2-4 शब्द कह देते। देश के युवाओं को सच में थोडा अच्छा लगा होता। लेकिन आपने कुछ नहीं बोला तो ज़रूर किसी खास काम में ही व्यस्त रहे होंगे , अब आपके प्रशंशक तो यही बोलते फिर रहे हैं। खैर आप मजे लेते रहिये वैसे भी आपका परिवार यही करते आ रहा है पीछे 70 सालों से। हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं, इससे ज्यादा नहीं बोल सकते।
चलो भाई इनकी अम्मा जी को रो लेने देते हैं, देश की बेटी के भयावह बलात्कार पर तो इन्होने आंसू बहाए नहीं, जब देश के दो बहादुर सैनिकों का सर पाकिस्तानी बड़ी ही बेदर्दी से काट के ले गए तब भी इनके बहते आंसू दिखे नहीं , जब असाम में हिंसा हो रही थी तब भी इनके रोने का खबर तो अखबारों की सुर्खियाँ नहीं बना, लेकिन अब रो रही हैं तो रो लें।
एक खास राजनीतिक दल है, आज़ादी के 65 सालों में इन्होने 50 से ज्यादा सालों तक राज़ किया है इस देश पर। और उन सालों में एक खास परिवार ने 35 सालों के आस पास राज़ किया है , उसी परिवार का लड़का उस परिवार संचालित राजनीतिक दल का नया उपाध्यक्ष चुन लिया जाता है। गौरतलब है की उसकी अम्मा पिच्च्ले 15 सालों से उस खास दल की अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हैं, अब निर्वाचित हैं या जो भी हैं हम ज्यादा टिपण्णी कर नहीं सकते न ही करना चाहते। भाई तुम्हारी फॅमिली ओन्ड पोलिटिकल पार्टी है जो करना है करो लेकिन देश दुनिया को ये तो कह कह के गुमराह तो मत ही करो कि तुम लोगों ने देश के लिए ये किया, वो किया। किया तो तुमने अपने परिवार के अलावा किसी के पप्पा के लिए भी नहीं। इनके घर का कुत्ता भी इस देश के किसी साधारण व्यक्ति से ज्यादा सुविधाएं उठाता है, और ये मगरमच्छ वाले आंसू बहाते फिरते हैं की हमने ये खोया और वो खोया।
इस देश के जो अनपढ़ लोग हैं, या कम पढ़े लिखे लोग जो हैं वो तो अब तक इनको यही समझ के वोट देते आ रहे हैं कि ये महात्मा गाँधी के वंशज हैं। मेरे गाँव के भी जो वृद्ध लोग हैं या जो जवान भी है अधिकतम यही सोचते हैं की ये ही असली गाँधी हैं। कई बार समझाने की कोशिश की लेकिन नतीजा वोही ढाक के तीन पात। शायद 1997 या 1998 का साल था जब मैं महात्मा गाँधी के पोते से मिला था, वो उस समय भुवनेश्वर से गाँधी जी की अश्थियाँ ले कर लौट रहे थे पुरुषोत्तम एक्सप्रेस से। ट्रेन का सासाराम स्टेशन पर 4-5 मिनट का स्टॉप था, उस समय मैं वहां पर ही रहता था, तो मैं भी स्टेशन चला गया उनसे मिलने। तकरीबन 3-4 मिनट की मुलाकात में ही उन्होंने बताया की उनका परिवार साऊथ अफ्रीका में रहता है और वंही पर खुश हैं क्यूंकि उनकी जगह तो यहाँ किसी और ही परिवार ने ले रखी है। उस समय राजनीतिक रूप से इतना परिपक्व नहीं था इसलिए उनके कहने का मतलब नहीं समझ पाया था, लेकिन आज जब उनकी बातें याद आती हैं तो समझ में आता है की उनकी व्यथा गलत भी नहीं थी।
एक और बात कही भाई साहब ने आंसू बहाते हुए और चिट्टा पढ़ते हुए। गौर कीजियेगा बिना चिट्टा के न तो ये कुछ बोल पाते हैं न ही इनकी अम्मा जी, फिर भी सबसे बड़े वाले हिंदुस्तानी यही हैं। ठेका इनके और इनके परिवार के नाम ही हैं भारतीयता का। इनके परिवार से बड़ा देशभक्त तो शायद ना मंगल पाण्डेय रहे होंगे न ही रानी लक्ष्मी बाई और नहीं तात्या टोपे जी। इनके परिवार के आगे तो भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, राजगुरु, सुखदेव का भी नाम नहीं आने देते इनके पारिवारिक दल के कार्यकर्ता। हाँ तो मैं बता रहा था की इन साहेबान ने कहा क्या, भाई साहब व्याख्यान दे रहे थे की इन्होने जिसके साथ बैडमिंटन खेलना सीखा उन्हीने इनके सर से सब छीन लिया। सही में छीन लिया या दे दिया। भाई साहब इसका फैसला अब आप लोग ही कर लो की मज़े कौन ले रहा है और कौन सर से सब कुछ छीने जाने के कारण विवशता की जिंदगी जीने को विवश है।
एक बात तो बताना भूल ही गया की ये जो भाई साहब अगला प्रधान मंत्री बनने की ख्वाइश देख रहे हैं और खुद को युवा युवा करते नहीं थकते, इनकी उम्र इस देश के सबसे उम्रदराज़ युवा से तकरीबन 12 साल ही ज्यादा है। अब सिर्फ अगर शादी न हो तो बंदा युवा थोड़े ही रहता है। भाई साहब उम्र तुम्हारी खुद तुम्हारा साथ छोड़ते जा रही है और तुम खुद को युवा युवा करते जा रहे हो। हमारे तरफ तो अगर इस उम्र में किसी की शादी न हो तो लोग पता नहीं किस किस चिकित्सीय उपचार की सलाह दे देते हैं, लेकिन आप स्वयंभू युवराज हैं मजे लीजिये ज़िन्दगी के। और इतने ही युवा हो तो भाई साहब युवाओ के ऊपर हो रहे अत्याचार के विरोध में भी 2-4 शब्द कह देते। देश के युवाओं को सच में थोडा अच्छा लगा होता। लेकिन आपने कुछ नहीं बोला तो ज़रूर किसी खास काम में ही व्यस्त रहे होंगे , अब आपके प्रशंशक तो यही बोलते फिर रहे हैं। खैर आप मजे लेते रहिये वैसे भी आपका परिवार यही करते आ रहा है पीछे 70 सालों से। हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं, इससे ज्यादा नहीं बोल सकते।
चलो भाई इनकी अम्मा जी को रो लेने देते हैं, देश की बेटी के भयावह बलात्कार पर तो इन्होने आंसू बहाए नहीं, जब देश के दो बहादुर सैनिकों का सर पाकिस्तानी बड़ी ही बेदर्दी से काट के ले गए तब भी इनके बहते आंसू दिखे नहीं , जब असाम में हिंसा हो रही थी तब भी इनके रोने का खबर तो अखबारों की सुर्खियाँ नहीं बना, लेकिन अब रो रही हैं तो रो लें।
Saturday, January 19, 2013
कश्मीरी पंडितों की पूरी कौम अपने ही देश में विस्थापित रहने को मजबूर क्यों ?
इस शीर्षक पर लिखने के बारे में सोच तो काफी अरसे से रहा था लेकिन दिन आज का चुना क्यूंकि आज का दिन ही कश्मीर की इतिहास का वो कला दिन है जब कश्यप ऋषि की तपोभूमि कश्मीर की धरती से स्वयं कश्मीरी पंडितों को ही विस्थापित होने के लिए मजबूर होना पड़ा था। वो कश्मीरी पंडित जो सैकड़ों सालों से वहां रह रहे थे, जो उनके लिए सिर्फ घर नहीं बल्कि जन्नत था। एक पूरी की पूरी पीढ़ी जो अपना फूल सा बचपन भी जी नहीं पाइ थी और उन्हें राहत शिविरों , विस्थापन केन्द्रों में जीवन व्यतीत करने के लिए विवश होना पड़ा। ये पूरी पीढ़ी अपना बचपन तो नहीं ही जी पाई और समय से पहले ही इन्होने वक़्त के वो सारे थपेड़े झेले, जिसने इन्हें अचानक से ही मानसिक रूप से व्यस्क बना दिया। आज भी लाखों परिवार राहत शिविरों में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं और इन्ही रहत शिविरों में ही जीवन व्यतीत करते करते करते अपने घर जाने की आस में ही हज़ारों लोग दुनिया से रुख्शत कर चुके हैं। कभी ये भारत के धनवानों में मानी जाने वाली पूरी कौम, आज जिल्लत भरी ज़िन्दगी जीने को मजबूर हैं।
मेरी धुंधली यादों में कही थोड़ी सी याद बाकी है , कभी कभी कुछ महिलाएं छोटे छोटे बच्चों के साथ हमारे शहर में हमारे घरो में आती थी और अपनी व्यथा बताती थी। उनकी व्यथा सुनके महिलाओ की आँखे भर आती थी और जिससे जितना हो सकता था वो अपनी हैसियत के हिसाब से उनकी मदद करता था। उनके बात करने के लहजे और पहनावे को देख कर यही सोचा करता था की ये क्यों ऐसे जीने पे मजबूर हैं। उस समय उतना पता नहीं चलता था, लेकिन जैसे जैसे बड़ा हुआ कश्मीरी पंडितों के बारे में पढने और जानने का मौका मिला तो खुद पर आत्मग्लानी हुई कि कैसे हमारे ही देश के पूतों को अपने घर से भाग कर विस्थापितों की तरह रहने को विवश होना पड़ रहा है। ये हमारे भारत के हजारों वर्षों के स्वर्णिम इतिहास में निःसंकोच एक काला धब्बा ही है।
आखिर क्यूँ हमारी सरकार इस पूरी कौम को इनके हाल पर जीने के लिए छोड़ चुकी है। इनकी सहायता के नाम पर कुछ राहत और विस्थापन शिविर बना दिए गए हैं जिनकी हालत भी अन्य सरकारी योजनाओ के जैसी ही है। कश्मीरी पंडितो की ये हालात आज ऐसे हैं उसका सबसे बड़ा कारण ये है की इनकी संख्या बहुत कम है। ये किसी भी राजनीतिक दल के लिए एकमुश्त वोट बैंक नहीं हैं। ये अलग अलग जगहों पर रह रहे हैं इसलिए इनकी संख्या इतनी नहीं है की ये कि ये चुनावों में एक सार्थक वोट बैंक साबित हो पायें, इसलिए किसी भी राजनीतिक दल ने इनकी समस्या को लेकर कभी कोई इमानदार प्रयास शायद ही किया। इतनी सारी यातनाएं और यहाँ तक की देश के सरकार द्वारा भी अपने हाल पर छोड़ दिए जाने के बावजूद इस कौम में समय के साथ साथ आगे बढ़ना सीख लिया है। समय की विपरीत धाराओं में भी आगे बढ़ते हुए आज ये कौम फिर से पुराने स्वर्णिम दिनों को पाने की आस में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन न ही केंद्र की सरकार ने और न ही जम्मू कश्मीर की राज्य सरकार ने ही इनको सार्थक रूप से मदद की, इस बात की कसक तो इन लोगों के मन में अवश्य ही होगी। यही उम्मीद करूँगा कि जल्दी ही ये मेरे भाई बहन फिर से अपने घर कश्मीर को लौट सके और फिर से अपनी ऐतिहासिक स्वर्णिम ऊँचाइयों को छू सके।
मेरी धुंधली यादों में कही थोड़ी सी याद बाकी है , कभी कभी कुछ महिलाएं छोटे छोटे बच्चों के साथ हमारे शहर में हमारे घरो में आती थी और अपनी व्यथा बताती थी। उनकी व्यथा सुनके महिलाओ की आँखे भर आती थी और जिससे जितना हो सकता था वो अपनी हैसियत के हिसाब से उनकी मदद करता था। उनके बात करने के लहजे और पहनावे को देख कर यही सोचा करता था की ये क्यों ऐसे जीने पे मजबूर हैं। उस समय उतना पता नहीं चलता था, लेकिन जैसे जैसे बड़ा हुआ कश्मीरी पंडितों के बारे में पढने और जानने का मौका मिला तो खुद पर आत्मग्लानी हुई कि कैसे हमारे ही देश के पूतों को अपने घर से भाग कर विस्थापितों की तरह रहने को विवश होना पड़ रहा है। ये हमारे भारत के हजारों वर्षों के स्वर्णिम इतिहास में निःसंकोच एक काला धब्बा ही है।
आखिर क्यूँ हमारी सरकार इस पूरी कौम को इनके हाल पर जीने के लिए छोड़ चुकी है। इनकी सहायता के नाम पर कुछ राहत और विस्थापन शिविर बना दिए गए हैं जिनकी हालत भी अन्य सरकारी योजनाओ के जैसी ही है। कश्मीरी पंडितो की ये हालात आज ऐसे हैं उसका सबसे बड़ा कारण ये है की इनकी संख्या बहुत कम है। ये किसी भी राजनीतिक दल के लिए एकमुश्त वोट बैंक नहीं हैं। ये अलग अलग जगहों पर रह रहे हैं इसलिए इनकी संख्या इतनी नहीं है की ये कि ये चुनावों में एक सार्थक वोट बैंक साबित हो पायें, इसलिए किसी भी राजनीतिक दल ने इनकी समस्या को लेकर कभी कोई इमानदार प्रयास शायद ही किया। इतनी सारी यातनाएं और यहाँ तक की देश के सरकार द्वारा भी अपने हाल पर छोड़ दिए जाने के बावजूद इस कौम में समय के साथ साथ आगे बढ़ना सीख लिया है। समय की विपरीत धाराओं में भी आगे बढ़ते हुए आज ये कौम फिर से पुराने स्वर्णिम दिनों को पाने की आस में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन न ही केंद्र की सरकार ने और न ही जम्मू कश्मीर की राज्य सरकार ने ही इनको सार्थक रूप से मदद की, इस बात की कसक तो इन लोगों के मन में अवश्य ही होगी। यही उम्मीद करूँगा कि जल्दी ही ये मेरे भाई बहन फिर से अपने घर कश्मीर को लौट सके और फिर से अपनी ऐतिहासिक स्वर्णिम ऊँचाइयों को छू सके।
Thursday, January 17, 2013
राहत या आफत .... क्या दिया सरकार के इस नए फैसले ने ?
आज कल युपीए सरकार ने ये तय कर लिया है कि चाहे जो भी हो जाये हम आम जनता की बजा के ही मानेंगे। अभी पिछले दिनों पेट्रोल के दामो में कुछ बढ़ोतरी की गयी थी और आज शाम सरकार ने आम जनता को फिर से दो तोहफे दिए हैं। एक तरफ डीजल के दामों का डीकंट्रोल यानि की अब इसके दामों का फैसला सरकार नहीं बल्कि तेल कम्पनियाँ स्वयं करेंगी, और दूसरी तरफ सरकार ने सब्सिडी वाले गैस सिलिंडर की संख्या में इजाफा किया है। अब 6 की बजाये 9 सिलेंडर सब्सिडी वाली मिला करेंगी। तेल कंपनिया पिछले कई दिनों से हल्ला मचा रही थी की उन्हें डीजल पर प्रति लीटर 9 रुपये का शुद्ध घटा हो रहा है, तो लो सरकार ने तेल कंपनियों को खुश कर ही दिया। अब डीजल की दामों में जल्दी ही बढ़ोतरी होगी और डीजल की दामों में बढ़ोतरी का असर रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ों के दामों में भी जल्दी ही देखने को मिलेगा।वैसे एक साथ 9 रुपये की बढ़ोतरी का जोखिम तो तेल कम्पनियाँ तो नहीं उठाएंगी लेकिन इतना तो मान के ही चलिए की हर महीने कम से कम 1 रुपये की बढ़ोतरी का बोझ तो आपकी जेब को उठाना ही पड़ेगा। डीजल का प्रयोग कृषि के क्षेत्र में काफी होता है। चाहे खेत की जुताई करने के लिए ट्रेक्टर हो या उसके फसल की सिंचाई करने के लिए जेनसेट हो ,दोनों में ही डीजल का उपयोग किसान करता है। आने वाले दिनों में डीजल के दाम बढ़ेंगे तो इसके सीधा असर किसान की लागत पर पड़ेगा ही। माल ढूलाई , परिवहन ,बिजली उत्पादन इन सब में डीजल का ही उपयोग होता है तो इनका लागत भी बढेगा। मतलब ये कि जेब तो आम जनता की ही कटेगी और लम्बे समय तक कटते ही रहेगी। ठीक वैसे ही जैसे बढ़ी हुयी सब्सिडी वाली सिलेंडर की संख्या का फायदा जल्दी ही लोगो को मिलेगा वैसे ही बढ़ी डीजल के दाम का असर लम्बे समय तक आम जनता की जेब पर पड़ता रहेगा। सरकार ने तो ये पहले से ही सोच रखा था कि सिलिंडर की संख्या में इजाफा करेंगे और इसे लागू करने के लिए सरकार ने एक हाथ में लड्डू तो दे दिया लेकिन दुसरे हाथ में जलती अंगीठी रख दी। लड्डू तो खा के ख़तम हो जायेगा लेकिन ये अंगीठी हाथ जलाते ही रहेगी। मिला जुला के देखा जाये तो सरकार ने आम जनता को आफत ज्यादा दिया है और जनता के हाथो में राहत के नाम पर एक झुनझुना मात्र ही थमाया है, तो ये झुनझुना थामिए और अब झुनझुना बजाते रहिये जब तक जी चाहे।
Wednesday, January 16, 2013
आखिर क्यूँ न अब सियासत की संधि वार्ताओं के दौर से बाहर निकला जाये
बचपन में मेरे घर के बगल में एक बालक रहता था , मेरी ही उम्र का था लेकिन हाथ पांव में मेरे से थोडा कमजोर था। हमेशा मुझे उंगली करते रहता था। मैं कुछ करू तो मेरे पिताजी से बोलने की धमकी देता था। कभी मेरी साईकल ले के भाग जाए तो कभी मेरा बल्ला ले के , क्रिकेट खेलने आये तो कहे की सिर्फ बैटिंग करने दे नहीं तो तेरे पापा से शिकायत कर के सूतवा दूंगा तुझे। 8-10 बार तो मैंने उसे कुछ नहीं कहा, लेकिन एक दिन मेरा दिमाग सटक गया और उस दिन वो मेरे हत्थे चढ़ गया। ढंग से खर्चा पानी दे दिया उस दिन मैंने उसे । खैर बाद में पापा ने मुझे भी ढंग से लपेटे में लिया लेकिन मुझे इसका कोई मन में मसोस नहीं रहा क्यूंकि एक फायदा भी हुआ। वो लौंडा उसके बाद से मेरे से 10 फीट की दुरी मेन्टेन करने लगा। मेरी उम्र 8-10 साल रही होगी, मैंने तो मामले की गंभीरता समझते हुए मसला खुद ही हल कर दिया।
लेकिन 65 साल की उम्र में हमारी सरकार न समझ पाई अभी तक। उम्मीद करता हूँ की सरकार का भी मानसिक विकास हो , और वो ये समझने में सक्षम हो की सिर्फ कूटनीतिक तरीका ही एकमात्र साधन नहीं है। समय आ गया की सियासत की संधि वार्ताओं के दौर से बाहर निकला जाये। समय आ गया है अपनी सामरिक शक्ति का इस्तेमाल करने का और पाकिस्तान को उसके करनी का जवाब उसी की भाषा में देने का। क्यूंकि एक सीमा तक ताकत पर तमीज की लगाम जरूरी है ,मगर इतनी भी नहीं की वह स्वयं अपने देशवासियों की नज़र में ही बुजदिली बन जाये। अब तो इस बात में कतई भी संदेह नहीं रह गया कि हमारा मुकाबला एक आतंकी
संगठन से है, जो सेना के वेश भर में है। सेना के कुछ उसूल होते हैं। एक जवान का
दूसरे जवान के प्रति व्यवहार की मर्यादा भी निश्चित होती है। लेकिन पिछले दिनों तो पाकिस्तानी सेना का व्यव्हार न सिर्फ सेना के उसूलों से परे रहा है बल्कि ये तो बर्बरता का एक नृशंश उदहारण भी है। पाकिस्तानी सेना द्वारा किया गया ये घ्रिनीत कार्य दया के काबिल तो नहीं है। इन परिस्थितियों में भारत को एक बार फिर से अपने स्थिति पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है। आखिर कब तक हम पाकिस्तान की ऐसी हरकतों को बर्दाश्त करते रहेंगे। अगर ऐसे हालत में लगता है की जंग लाजिमी है तो जंग ही सही। Monday, January 7, 2013
ये कैसा राम राज्य जहा स्वयं राम अपनी इच्छा से नहीं रह सकते ।
नारद जी से तो आप सभी भली भांति परिचित होंगे। अगर नहीं भी हैं तो मैं हूँ ना आपसे उनका परिचय कराने के लिए। नारद जी जो हैं वो हैं देवलोक के चलते फिरते समाचार संवाददाता। घूमते टहलते भारतवर्ष आये तो मुंबई शहर की ओर निकल गए। नारायण नारायण करते हुए चक्कर काट ही रहे थे की अचानक उनकी नज़र किसी जाने पहचाने व्यक्तित्व की और पड़ी, उन्होंने सोचा नहीं ये 'वो' नहीं हो सकते परन्तु जिज्ञासावश जब स्वयं को रोक न पाए और पहुँच गए नारायण नारायण करते हुए।
"भगवन, आप और यहाँ इस तत्काल आरक्षण की कतार में क्या कर रहे हैं ?" नारद ने मिलते ही ये सवाल दागा।
लेकिन जिससे ये सवाल दागा गया था उसने इगनोर करते हुए अपने मोबाइल पर आये SMS को पढना ज्यादा ज़रूरी समझा और नारद की तरफ देखना भी मुनासिब नहीं समझा।
नारद ने सोचा की मेरी आँखे धोखा नहीं खा सकती , किन्तु ये मुझे पहचान क्यों नहीं रहे ? ये सोचते हुए उन्होंने कतार में खड़े व्यक्ति के चरण स्पर्श करने की कोशिश की लेकिन उसने फिर से उसे घुड़की दे दी और फिर आरक्षण क्लर्क को अपना फॉर्म दिया और अपने आरक्षण के टिकट का इंतज़ार करने लगे।
वोही दूर खड़े होकर स्वयं नारद भी उस व्यक्ति के फ्री होने का इंतज़ार करने लगे। जैसे ही वो व्यक्ति अपना टिकट लेकर वहां से निकला नारद जी उसके पीछे हो लिए। आगे चलते हुए व्यक्ति ने कुछ एकांत में पहुचने के बाद पीछे मुड़ कर देखा और नारद को आवाज़ लगा कर कहा "नारद , आ जाओ , मैं जनता हूँ की तुम मेरे पीछे पीछे चल रहे हो"
नारद जी खम्भे की ओट से निकल कर बाहर आये और कहा "प्रभु , आपने मुझे पहचानने से इंकार क्यों किया ?"
सामने खड़े व्यक्ति ने नारद को कहा की आओ खोली में चलो वही बाते करेंगे , ऐसे सड़क पर आराम से बातें नहीं हो पाएंगी। ऐसा कह के दोनों साथ में खोली की तरफ बढ़ लिए।
खोली पहुंच कर व्यक्ति ने उनसे कहा की बैठो नारद, किन्तु नारद ने पहले व्यक्ति के चरण स्पर्श करते हुए पूछा, "भगवन श्री राम , आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, वहां रिजर्वेशन की कतार में आपने मुझे पहचानने से इंकार क्यों किया? क्या मुझसे कोई गलती हो गयी भगवन?"
राम ने उन्हें बैठाते हुए कहा की "देखो आज कल यहाँ मुंबई में माहौल हमारे रहने लायक नहीं रह गया है , अब तो यहाँ से निकल के वापस अपने अयोध्या की तरफ चले जाने में ही भलाई है। पहले तो ये राज ठाकरे कहता था की की ये उत्तर प्रदेश और बिहार वालों को मुंबई से निकालो, उस समय तो किसी तरह छुप छुपा कर इस खोली में रह रहा था, लेकिन अब तो इसने एक नया शिगूफा फैला रखा है। आज कल ये जगह जगह कहता फिर रहा है कि ये बिहार और उत्तर प्रदेश वाले सारे अपराधी ही होते हैं। अब तुम ही बताओ मैंने तो इस संसार से रावण जैसे अपराधी का विनाश कर के दुनिया को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी।
लेकिन अब कलयुग में यही सुनना बाकि रह गया था कि हमारे प्रदेश और हमारे ससुराल (बिहार, सीताजी का मायका बिहार की मिथिला प्रान्त में है) प्रदेश के सारे लोग अपराधी होते हैं। अब इससे पहले की मेरे ऊपर कोई ऐसा इल्जाम लग जाये, मेरा यहाँ से वापस चला जाना ही बेहतर होगा।" इतना कहते हुए उन्होंने अन्दर के कमरे की तरफ आवाज़ लगते हुए कहा, "सीते, पिछले 17 दिनों से तत्काल टिकट के लिए स्टेशन जा रहा था , और आखिरकार कल शाम की दरभंगा के ट्रेन में जाने की कन्फर्म टिकट मिल गयी है , तुम काफी दिनों से मायके जाने की बात कह रही थी न, चलो चलते हैं। कुछ दिन ससुराल में व्यतीत करके अयोध्या वापस चलेंगे। अब यहाँ रहकर ये और नहीं सुन सकता की उत्तर प्रदेश और बिहार के सारे लोग अपराधी होते हैं।" इतना सुनने के बाद देवर्षि नारद भी जाने की आज्ञा ले कर वापस चले गए।
"भगवन, आप और यहाँ इस तत्काल आरक्षण की कतार में क्या कर रहे हैं ?" नारद ने मिलते ही ये सवाल दागा।
लेकिन जिससे ये सवाल दागा गया था उसने इगनोर करते हुए अपने मोबाइल पर आये SMS को पढना ज्यादा ज़रूरी समझा और नारद की तरफ देखना भी मुनासिब नहीं समझा।
नारद ने सोचा की मेरी आँखे धोखा नहीं खा सकती , किन्तु ये मुझे पहचान क्यों नहीं रहे ? ये सोचते हुए उन्होंने कतार में खड़े व्यक्ति के चरण स्पर्श करने की कोशिश की लेकिन उसने फिर से उसे घुड़की दे दी और फिर आरक्षण क्लर्क को अपना फॉर्म दिया और अपने आरक्षण के टिकट का इंतज़ार करने लगे।
वोही दूर खड़े होकर स्वयं नारद भी उस व्यक्ति के फ्री होने का इंतज़ार करने लगे। जैसे ही वो व्यक्ति अपना टिकट लेकर वहां से निकला नारद जी उसके पीछे हो लिए। आगे चलते हुए व्यक्ति ने कुछ एकांत में पहुचने के बाद पीछे मुड़ कर देखा और नारद को आवाज़ लगा कर कहा "नारद , आ जाओ , मैं जनता हूँ की तुम मेरे पीछे पीछे चल रहे हो"नारद जी खम्भे की ओट से निकल कर बाहर आये और कहा "प्रभु , आपने मुझे पहचानने से इंकार क्यों किया ?"
सामने खड़े व्यक्ति ने नारद को कहा की आओ खोली में चलो वही बाते करेंगे , ऐसे सड़क पर आराम से बातें नहीं हो पाएंगी। ऐसा कह के दोनों साथ में खोली की तरफ बढ़ लिए।
खोली पहुंच कर व्यक्ति ने उनसे कहा की बैठो नारद, किन्तु नारद ने पहले व्यक्ति के चरण स्पर्श करते हुए पूछा, "भगवन श्री राम , आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, वहां रिजर्वेशन की कतार में आपने मुझे पहचानने से इंकार क्यों किया? क्या मुझसे कोई गलती हो गयी भगवन?"
राम ने उन्हें बैठाते हुए कहा की "देखो आज कल यहाँ मुंबई में माहौल हमारे रहने लायक नहीं रह गया है , अब तो यहाँ से निकल के वापस अपने अयोध्या की तरफ चले जाने में ही भलाई है। पहले तो ये राज ठाकरे कहता था की की ये उत्तर प्रदेश और बिहार वालों को मुंबई से निकालो, उस समय तो किसी तरह छुप छुपा कर इस खोली में रह रहा था, लेकिन अब तो इसने एक नया शिगूफा फैला रखा है। आज कल ये जगह जगह कहता फिर रहा है कि ये बिहार और उत्तर प्रदेश वाले सारे अपराधी ही होते हैं। अब तुम ही बताओ मैंने तो इस संसार से रावण जैसे अपराधी का विनाश कर के दुनिया को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी।
लेकिन अब कलयुग में यही सुनना बाकि रह गया था कि हमारे प्रदेश और हमारे ससुराल (बिहार, सीताजी का मायका बिहार की मिथिला प्रान्त में है) प्रदेश के सारे लोग अपराधी होते हैं। अब इससे पहले की मेरे ऊपर कोई ऐसा इल्जाम लग जाये, मेरा यहाँ से वापस चला जाना ही बेहतर होगा।" इतना कहते हुए उन्होंने अन्दर के कमरे की तरफ आवाज़ लगते हुए कहा, "सीते, पिछले 17 दिनों से तत्काल टिकट के लिए स्टेशन जा रहा था , और आखिरकार कल शाम की दरभंगा के ट्रेन में जाने की कन्फर्म टिकट मिल गयी है , तुम काफी दिनों से मायके जाने की बात कह रही थी न, चलो चलते हैं। कुछ दिन ससुराल में व्यतीत करके अयोध्या वापस चलेंगे। अब यहाँ रहकर ये और नहीं सुन सकता की उत्तर प्रदेश और बिहार के सारे लोग अपराधी होते हैं।" इतना सुनने के बाद देवर्षि नारद भी जाने की आज्ञा ले कर वापस चले गए।
Monday, December 24, 2012
एक जन आंदोलन के दमन का पुलिसिया तरीका
सरकार की तरफ से ऐसा कोई सकारात्मक प्रयास नहीं किया गया की प्रदर्शनकारियो से बात की जाए और उनकी मांगो पर गौर किया जाए। अगर दिल्ली की जनता ये चाहती है की सरकार उनकी सुरक्षा की समुचित व्यवस्था करे तो क्या ये मांग जायज़ नहीं है ? अगर महिलाए ये चाहती हैं की वो बेरोक टोक घर से बाहर आ जा सके क्या ये उनका अधिकार नहीं है ? अगर बलात्कार का शिकार हुयी महिला के अपराधियो को कड़ी से कड़ी सज़ा का प्रावधान करने की मांग सरकार से की जाती है तो क्या ऐसा करना जायज़ नहीं है ? इन सभी प्रश्नों का जवाब आखिर जनता चाहती है तो इसमे क्या बुराई है?
देश की जनता के सामने खुद को देश का युवा नेता होने का दंभ भरने वाले नेता कहा गए , क्यू नहीं उन्होने जनता के सामने आ कर उनका कष्ट जानने की कोशिश की , क्यू वो जनता के गुस्सा का सामना नहीं करना चाहते? इसलिए क्यूंकी इन सबके अंदर ये अहम भर गया है की ये तो देश के राजा हैं। जनता अगला चुनाव आते आते सब भूल जाएगी , लेकिन अब समय आ गया है की इनको इनके अहंकार का जवाब देने का। इनके खुद के नेता पुलिस को लाठी भाँजने का आदेश देते हैं और फिर कैमरे के सामने आकार पुलिस के मुखिया को बदलने की बाते करते हैं ताकि जनता पुलिस के इस कार्यवायी को भूल जाए।
इस आंदोलन का दमन करने के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा जो किया गया उसकी जितनी भी निंदा की जाए वो कम है। पुलिस के आला अफ़सरान आगे आकार भीड़ से बात कर सकते थे और प्रदर्शनकारियो की बातों पर गौर कर सकते थे। पुलिस की कारवाई मे न सिर्फ आम जनता को घायल किया अपितु इस सम्पूर्ण आंदोलन का प्रसारण कर रहे मीडिया के लोगो और कैमरो को भी पूलिसिया कारवाई का निशाना बनाया गया। इस लाठी चार्ज की नृशंश कार्यवायी से पुलिस और सरकार दोनों ने आम जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता को खोया ही है।
Friday, December 7, 2012
देश के सभी मर्जो की एक ही दवा है - खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
सरकार का कहना है की देश में किसान को उसके उत्पाद का केवल 16 % भाव ही मिल पाता है और शेष बिचौलियों के पास चला जाता है और अगर FDI आ गयी तो किसानों को उनके हक का पूरा पैसा मिलेगा। लगता है सरकार के पढ़े लिखे मंत्री जो विदेशों की यात्राए करने में तो बड़े ही आगे रहते हैं , लेकिन वहाँ जाकर अपने 5 सितारा होटल से बाहर निकल के वहां के किसानो का हाल पूछने की कोशिश नही करते। अमेरिका में भी किसान इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जाल में फसे हुए और उन्हें भी अपने उत्पाद का बहुत अच्छा मोल नहीं मिल पाता। वहां के किसान एक तरीके से इन कंपनियों के बंधुआ मजदूर ही बने हुए हैं और खेती उनके इशारो पर ही कर पाते हैं। वो ही उत्पाद उगा पाते हैं जिनको उगाने का आदेश वो कंपनिया देती हैं।और अगर किसानो द्वारा उगाई गए उत्पाद उनके मापदंडो के अनुरूप नहीं हैं तो पूरा का पूरा खेती ये कंपनिया लेने से इंकार कर देती हैं। और फिर वो उस उत्पाद को कही और बेच भी नहीं सकते , इस तरह से पूरी की पूरी खेती और उस पर किया गया खर्चा बर्बाद।और अगर सरकार के नुमाईंदे इस बात से वाकिफ हैं की किसान को यहाँ उसके उत्पाद का सही मोल नहीं मिल पता तो आज़ादी के पिछले 65 सालों में इन्होने किया क्या किसानो के लिए? क्यों नहीं इन्होने ऐसी साफ़ सुथरी सरकारी प्रणाली बनाई की किसान आराम से अपने उत्पाद आ कर बेच सके और उसे अपने उत्पाद का सही मोल मिल सके। तो इसका जवाब भी सुनिए सरकार चाहती है की सारा काम स्वयं से ही हो जाये और ये बस घोटाले पर घोटाले कर के देश के गरीबो का खून चूसते रहे। अगर 65 सालो में ,जिसमे से ज्यादातर समय तक देश पर कांग्रेस का शाषण था, देश के किसानो , यहाँ के बेरोजगारों और गरीबों का उद्धार सरकारे नहीं कर पायी तो FDI ले कर आने वाली इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पास कौन सा अल्लाद्दीन का चिराग है की बस उसे घुमाते भर से ही देश की सारी समस्याओ का समाधान हो जायेगा। ये सिर्फ देश और देशवासियों को गुमराह करने की बात है जिसमे शायद देश की गरीब जनता गुमराह हो भी जाये , परन्तु इसके दुष्परिणाम जल्दी ही देशवासियों को समझ में आने लगेंगे। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ कोई चैरिटी करने तो इस देश में आ नहीं रही हैं , वो यहाँ से पैसा कमाने आ रही हैं और कमा के वापस ले जाने ही आ रही हैं।
सबसे मज़े की बात तो ये है की देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश की नुमाईंदगी करने वाली दो सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टियाँ जो वैसे तो FDI की मुकल्फत करते हैं परन्तु जब देश की संसद के भीतर इतने गंभीर प्रश्न पर वोटिंग का मौका आता है तो वो संसद से बहिर्गमन का रास्ता अख्तियार करते हैं। मेरा सवाल हैं उन पार्टियों से की अरे वापस जाकर क्या बताओगे अपने प्रदेश के गरीब किसानो को की यु तो हमे पता है की इससे तुम्हारा भला नहीं होने वाला लेकिन इससे पहले की हमारे धोती खुले हमने तुम्हारी लंगोटी तक बेच दी। ये वो ही पार्टियाँ हैं जो समाजवाद , दलितों और पिछड़े वर्गों के लोगो की बाते कर कर के संसद तक तो पहुच जाते हैं लेकिन यही आ कर उन्हें ही बेच देते हैं। खैर अब तो सरकार ने FDI को इजाज़त दे ही दी हैं जल्दी ही विदेशी कंपनियों के स्टोर्स खुलेंगे , देखता हूँ कब तक देश की समस्या का समाधान हो जाता है।
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